Thursday, August 2, 2012

रिश्तों की धूपछाँव

अब के बिछ्ड़े तो शायद ख्वाबों में मिले; जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिले...image created by me



 रेडियो पर गाना बज रहा है
भैया मेरे राखी के बन्धन को निभाना
भैया मेरे छोटी बहन को ना भूलाना...
उसकी नज़र रह रह कर दरवाज्ञे की ओर उठ रही है; पर उसे पता है, भैया आज भी नहीं आयेंगे...दिन, महीने और अब तो साल भी गुज्ञ्ररने लगे हैं;  उसकी राखी आज भी उस कलाई के इन्तज्ञार में है; बचपन में जिस पर पहली बार राखी बाँधना भी भैया ने ही सिखाया था ।
आज भाई की कलाई सूनी है
, उनके माथे पर चमकने वाला मंगल टीका लहु बनकर उनकी  आँखों में उतर आया है ।
पति की मौत के बाद यदि पिताजी ने रहने के लिये ये मकान ना दिया होता तो आज उसे किसी आश्रम का सहारा लेना पड़ता  और यही मकान आज भैया की नाराज्ञगी का कारण बन गया है ।
जिस घर के आँगन में भाई-बहन  का बचपन खेला करता था; आज उसी घर का मूल्य यादों के बजाय रूपयों में तौला जा रहा है । महँगाई की मार ने रिश्तों को भी खोखला कर दिया है ।
बू्ढ़े माँ-बाप की सूनी नज्ञरें दीवार पर लगे फ्रेम से अपनी गोद में खेले बच्चों के बीच का तमाशा देख रही हैं और सोच रहीं हैं; हमसे कहाँ चूक हो गई इनके पालन में ?! वस्तु का मूल्य धन से लगाना तो ये सीख गये; रिश्तों का मूल्य ये क्यों नहीं समज पाये !
"आन्टी, आज आपकी क्लास में छुट्टी है क्या ?"
आठ साल की नीलिमा की आवाज्ञ से उसके विचारों की तंद्रा टूटी ।
"हाँ बेटा, आज रक्षाबन्धन है ना !"
"मुझे भी छुट्टी है स्कुल में । अभी मैं सोनुभैया को राखी बाँधुंगी, फिर हम खूब खेलेंगे ।"
छोटी नीलिमा की बातों से उसे अपने बचपन के दिन याद आ गये; जब वह भी अपने भैया के साथ छुट्टियों में  दिन भर इसी आँगन में खेला करती थी । उसे याद आया; कैसे एक बार खेलते खेलते वह गिर गई थी और उसके घूटने पर चोट लगी थी । भैया ने अपनी कमीज्ञ से उसका खून साफ  किया था और कमीज्ञ खराब करने की वजह से माँ की डाँट भी खाई थी ।
"आन्टी, आप अपने भैया को राखी नहीं बाँधेंगी ?"
  नीलिमा के मासूम सवाल का क्या जवाब देती वह ! उसने नीलिमा के सर पर हाथ फेरा ।
"हाँ बेटा, मेरे भैया आयेंगे, तब मैं ज्ञरूर उन्हें राखी बाँधुँगी ।"
"नीलु, आ जाओ बच्चा, मामा आये हैं " पड़ोस से आवाज़ आई ।
किसी हिरनी की भाँति भागती हुई नीलिमा अपने घर दौड़ गई,  पर उसकी नन्हीं आवाज़ में एक सवाल छोड़ गई...
"आन्टी, आप अपने भैया को राखी नहीं बाँधेंगी ?"
रेडियो की आवाज्ञ खाली कमरे की दीवारों से टकरा कर गूँज रही थी...
शायद वो सावन भी आये जो पहला सा रंग न लाये....

6 comments:

meena said...

wow this is the sad reality now. rishte kahin kho se gaye hain aajkal

Kishore J.Katara said...

Every one remembers the song "Bhaiya mere rakhi ke bandhan ko nibhana" but no one remembers the song by Mohammad Rafi."Rakhi dhaagon ka tyohar.bandha hua ik ik dhaage mein bhai bahen ka pyar"

V. Khawani said...

thanks Meena & Kishore...
@ Kishore, only last night I was singing this song...bahan kahe mere veer tujhe na buri nazariya laage, mere raja bahiya tujhko meri umaria laage...it is one of my favourite songs.I just wrote about the song "bhaiya mere..."as I thought it more appropriate with this fiction I have written.

AmitAag said...

bahut pyari rachna, Vimla!

debajyoti said...

this is really sad. you have very nicely portrayed how our bonds change with time.

Arti said...

Very heartfelt and touching. How priorities change in life... Very beautifully written, Vimla.

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